खाने की कीमत : हिंदी कहानी | Hindi Kahani
दूसरे दिन वह अपने एक दोस्त की बेटी की शादी में गई। उसका नाम रेनू था। वह एक कामकाजी दिन था। 10:15 का समय था। एक तरफ उन लोगों के लिए बूफे तैयार था , जिन्हे ऑफिस जाने की जल्दी थी, दूल्हा दुल्हन पर जैसे ही आखरी अक्षत गिरी सबके पाव बुफे की तरफ मुड़ गए।
देखते ही देखते लंबी लाइन लग गई। लाइन खत्म होने का इंतजार करती हुई मैं मासी के पास खड़ी हो गई जो बर्तन बटोर रही थी।
बार-बार लाइन में खड़ा ना होना पड़े इसके लिए कई लोग थाली में बहुत ज्यादा खाना डाल रहे थे। लेकिन ऑफिस के लिए जल्दी और लंच का समय करीब होने की वजह से कई लोग अपनी थाली में का पूरा खाना खत्म नहीं कर रहे थे। किसी तरह चार निवाले चीमटकर उन्होंने थाली बटोर रही मौसी को थमा दी।उस मौसी का चेहरा एकदम उतर गया।
थाली इतनी भरी हुई होती थी कि मौसी उसे तुरंत कूड़ेदान में खाली नहीं करती थी बल्कि थाली में रखे भोजन पर निराश दृष्टि से देखती फिर कचरे के डिब्बे में खाली करती थी। में अपना भोजन समाप्त करने तक उस मौसी का अवलोकन कर रही थी।
धीरे-धीरे अपना खाना खत्म किया और अपनी थाली मौसी के हाथ में थमा दी। थाली पूरी तरह से खाली देखकर मासी के चेहरे पर संतोष झलक रहा था।
मैंने मासी से पूछा? मैं पीछे से देख रही थी, डिश में रखा खाना कूड़ेदान में डालने में आपको काफी परेशान हुई होगी?क्या ऑफिस के कर्मचारी आपको पूरा खाना देते हैं?
मासी उदास होकर बोली"मुझे मिल जाता हैं,लेकिन गांव में मेरे बच्चे भूखे हैं। दरसल हम किसान हैं, लेकिन खेत में हमारा पेट नहीं भर पाता था। इसलिए हम शहर आ गए काम देखने के लिए। रहने के लिए अच्छी जगह कहीं नहीं मिलती थी इसलिए बच्चो को गांव रखा है। उनके दादी और दादा जी रहते हैं उनके साथ। वहा सब भूखे हैं और इधर इतना सारा खाना बर्बाद हो रहा है।इसका काफी दुख हो रहा है मुझे।
मासी एक निवाला निगलते हुए कहने लगी, ऐसा लग रहा था जैसे वह अपना सारा दुख मेरे सामने रखना चाहती हो। हम किसान है, ये गेहूं ,चावल, और सब्जियां उगाने के लिए हमें कितना कष्ट होता है वह तुम लोगों को क्या पता और शहर वाले आराम का खाना फेंक देते हो।
बहुत मन को लगता है, वास्तव में बहुत से लोग से पानी पीकर ही तृप्त होना पड़ता है। एक वक्त के खाने के लिए वो दिन भर मेहनत करते हैं। मैं सुन्न थी! मासी को क्या जवाब दूं? मुझे समझ नहीं आ रहा था। मैं मुस्कुराते हुए वहां से चली गई।
जी मेरा नाम अन्नू है पूरा नाम अन्नपूर्णा और ये कहानी मैने आपको सुनाई है। उस दिन के बाद में अपने नाम का मान रखने लगी और खाने को कभी फेंकने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई।
ये कहानी सिर्फ मेरी या उस गरीब मौसी को नहीं है ये कहानी देश दो हिस्सो मे बटे लोगो की है जिसमे एक समूह के लोग जिन्हें आसानी से जरूरत से ज्यादा खाना मिलता है और एक हिस्से के लोगो को दिन भर की मेहनत के बाद भी भरपेट खाना नसीब नही होता। हमे ऐसे लोगो के लिए कुछ करना चाहिए और अगर ज्यादा कुछ ना कर पाए तो खाने को बर्बाद न करे तो भी बहोत होगा।
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